GURUKUL WITH ARYA GAUTAM ,7903268149
Q. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान (भाग्यशाली) कहने में क्या व्यंग्य निहित है।
[2012, 19]
उत्तर - गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में यह व्यंग्य निहित है कि उद्धव वास्तव में भाग्यवान न होकर अति भाग्यहीन है। वे कहना चाहती हैं कि हे उद्धव ! तुम बड़े अभागे हो कि कृष्ण रूपी सौंदर्य और प्रेम रस के सागर के सानिध्य में रहते हुए भी तुम उस असीम प्रेम का अनुभव नहीं कर सके, न कृष्ण के हो सके, न कृष्ण को अपना बना सके। तुमने प्रेम का आनंद जाना ही नहीं। यह तुम्हारा दुर्भाग्य है।
Q. बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के लिए अचरज का कारण क्यों थी ?
ANS- बालगोबिन भगत प्रतिदिन दो मील दूर नदी स्नान के लिए जाते थे। सुबह-शाम कबीर के गीत गाते खेती-बाड़ी करते, सभी कार्य स्वयं करते व गृहस्थ होते हुए भी साधुता का जीवन जीते थे। झूठ न बोलना, खरा व्यवहार करना, किसी की चीज़ को छूना और प्रत्येक नियम को बारीकी से पूरा करना लोगों के लिए कुतूहल का विषय था। सर्दी हो या गर्मी अपने भजन में तल्लीन रहना उनका विशेष गुण था। वृद्धावस्था में भी भगत जी की ऐसी दिनचर्या अचरज का कारण इन्हीं वजहों से बनी।
Q. संगतकार किन-किन रूपों में मुख्य गायक-गायिकाओं का सहयोग करते हैं?
[2009, 10, 13, 16, 20]
उत्तर – संगतकार निम्नलिखित रूपों में मुख्य गायक-गायिकाओं की मदद करते हैं-
i. गायन के समय यदि गायक-गायिका का स्वर भारी हो तो संगतकार अपनी आवाज से उसमें मधुरता भर देता है।
ii. जब गायन करते समय मुख्य गायक-गायिका अपनी लय को लाँघकर भटक जाते हैं तो संगतकार उस भटकाव को संभालता है।
iii. वे गायक-गायिका के अकेलेपन के अहसास को दूर करते हैं।
Iv. गायन के समय मुख्य गायक का स्वर धीमा होने लगता है तो वह उसकी गायन में अपने स्वर को मिलाकर उसकी गति को स्वर का साथ देता है।
i. गायन के समय यदि गायक-गायिका का स्वर भारी हो तो संगतकार अपनी आवाज से उसमें मधुरता भर देता है।
ii. जब गायन करते समय मुख्य गायक-गायिका अपनी लय को लाँघकर भटक जाते हैं तो संगतकार उस भटकाव को संभालता है।
iii. वे गायक-गायिका के अकेलेपन के अहसास को दूर करते हैं।
Iv. गायन के समय मुख्य गायक का स्वर धीमा होने लगता है तो वह उसकी गायन में अपने स्वर को मिलाकर उसकी गति को स्वर का साथ देता है।
Q. खेतीबारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे?
[2009, 12, 13, 16, 24]
उत्तर – बालगोबिन भगत गृहस्थ थे। वे साधु तो थे पर वैसे साधु नहीं, जैसा सामान्यतः माना जाता है। बालगोबिन अपनी निम्नांकित चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे—
(क) वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और खरा व्यवहार रखते थे।
(ख) वे स्पष्टवादी थे और किसी से खामखाह झगड़ा मोल नहीं लेते थे।
(ग) वे दूसरों की किसी चीज या स्थान को अपने व्यवहार में नहीं लाते थे।
(घ) वे अपने खेत में उत्पन्न वस्तु को कबीरपंथी मठ में ले जाते थे। वहाँ से प्रसाद स्वरूप जो मिलता उसे घर लाकर अपनी गुजर चलाते थे।
(क) वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और खरा व्यवहार रखते थे।
(ख) वे स्पष्टवादी थे और किसी से खामखाह झगड़ा मोल नहीं लेते थे।
(ग) वे दूसरों की किसी चीज या स्थान को अपने व्यवहार में नहीं लाते थे।
(घ) वे अपने खेत में उत्पन्न वस्तु को कबीरपंथी मठ में ले जाते थे। वहाँ से प्रसाद स्वरूप जो मिलता उसे घर लाकर अपनी गुजर चलाते थे।
Q. लेखिका (मन्नू भंडारी) के व्यक्तित्व पर किन-किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पड़ा? लिखिए।
[2022, 13, M.SET-22]
Ans- लेखिका के व्यक्तित्व पर मुख्य रूप से दो व्यक्तियों का प्रभाव पड़ा-
पिताजी का प्रभाव - लेखिका के व्यक्तित्व को बनाने-बिगाड़ने में उनके पिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने ही लेखिका के मन में हीनता की भावना पैदा की। उन्होंने ही उसे शक्की बनाया, विद्रोही बनाया। उन्होंने ही लेखिका को देश और समाज के प्रति जागरूक बनाया।
शीला अग्रवाल का प्रभाव - लेखिका को क्रियाशील, क्रांतिकारी और आंदोलनकारी बनाने में उनकी हिन्दी-प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का योगदान है। शीला अग्रवाल ने अपनी जोशीली बातों से लेखिका के मन में बैठे संस्कारों को कार्य-रूप दे दिया। उन्होंने लेखिका के खून में शोले भड़का दिए। पिता उसे चारदीवारी तक सीमित रखना चाहते थे, परन्तु शीला अग्रवाल ने उसे जन-जीवन में खुलकर विद्रोह सिखा दिया।
पिताजी का प्रभाव - लेखिका के व्यक्तित्व को बनाने-बिगाड़ने में उनके पिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने ही लेखिका के मन में हीनता की भावना पैदा की। उन्होंने ही उसे शक्की बनाया, विद्रोही बनाया। उन्होंने ही लेखिका को देश और समाज के प्रति जागरूक बनाया।
शीला अग्रवाल का प्रभाव - लेखिका को क्रियाशील, क्रांतिकारी और आंदोलनकारी बनाने में उनकी हिन्दी-प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का योगदान है। शीला अग्रवाल ने अपनी जोशीली बातों से लेखिका के मन में बैठे संस्कारों को कार्य-रूप दे दिया। उन्होंने लेखिका के खून में शोले भड़का दिए। पिता उसे चारदीवारी तक सीमित रखना चाहते थे, परन्तु शीला अग्रवाल ने उसे जन-जीवन में खुलकर विद्रोह सिखा दिया।
Q. लेखिका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर – लेखिका और उसके पिता के विचार आपस में टकराते थे। पिता लेखिका को देश-समाज के प्रति जागरूक बनाना चाहते थे किन्तु उसे घर तक ही सीमित रखना चाहते थे। वे उसके मन में विद्रोह और जागरण के स्वर भरना चाहते थे किन्तु उसे सक्रिय नहीं होने देना चाहते थे। लेखिका चाहती थी कि वह अपनी भावनाओं को प्रकट भी करे। वह देश की स्वतंत्रता में सक्रिय होकर भाग ले। यहीं आकर दोनों की टक्कर होती थी। विवाह के मामले में भी दोनों के विचार टकराए। पिता नहीं चाहते थे कि लेखिका अपनी मनमर्जी से राजेन्द्र यादव से शादी करे। परन्तु लेखिका ने उनकी परवाह नहीं की।
Q. आपके विचार से भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना क्यों भूल जाता है ?
ANS- भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना इसलिए भूल जाता है क्योंकि मित्रों की संगति में उसे खुशी और अपनापन महसूस होता है। जब वह अकेला होता है, तो उसे अपनी समस्याएँ और दुःख अधिक महसूस होते हैं, लेकिन दोस्तों के साथ होने पर उसका ध्यान उन दुखों से हट जाता है। और इसी कारण वह सिसकना भूल जाता है।
Q. 'नौबत खाने में इबादत' पाठ का संदेश क्या है?
Ans- इस पाठ से हमें गायन-कला के साथ ही साथ धार्मिक सौहार्द, कला-प्रेम और सादगी की प्रेरणा मिलती है। यह पाठ हमें प्रेरणा देती है कि हम किसी भी धर्म को मानें, दूसरे धर्म का भी समान आदर करें। ईश्वर के सभी रूपों के आगे नतमस्तक होना चाहिए। कलाकार को कभी-भी अपनी कला को पूर्ण नहीं मानना चाहिए। कोई कला कभी पूर्ण नहीं होती-आगे बढ़ते रहने का प्रयास करते रहना चाहिए। इस पाठ से हमें सरलता और सादगी की भी प्रेरणा मिलती है।
Q. कटाओ पर किसी भी दुकान का ना होना उसके लिए वरदान है कैसे? लिखिए
उत्तर : कटाओ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है क्योंकि इससे वहां की सुंदरता और शांति बनी रहती है। अगर वहां दुकानें खुल जाएं तो वहां गंदगी फैलेगी और वहां की सुंदरता खो जाएगी।
i. कटाओ सिक्किम का एक खूबसूरत और अनजाना-सा स्थान है।
ii. यह अपनी स्वच्छता और सुंदरता के लिए जाना जाता है।
iii. इसे हिंदुस्तान का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है।
iv. कटाओ में दुकान न होने से वहां लोगों की संख्या कम रहती है।
v. यदि कोई स्थान बिना दुकानों के है, तो वह अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांति को बनाए रख सकता है।
इसलिए कटाओ पर किसी भी दुकान का ना होना उसके लिए वरदान है
i. कटाओ सिक्किम का एक खूबसूरत और अनजाना-सा स्थान है।
ii. यह अपनी स्वच्छता और सुंदरता के लिए जाना जाता है।
iii. इसे हिंदुस्तान का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है।
iv. कटाओ में दुकान न होने से वहां लोगों की संख्या कम रहती है।
v. यदि कोई स्थान बिना दुकानों के है, तो वह अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांति को बनाए रख सकता है।
इसलिए कटाओ पर किसी भी दुकान का ना होना उसके लिए वरदान है
Q. लेखक ने अपने आपको हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता कब और किस तरह महसूस किया?
[2009, 13, 17]
उत्तर- लेखक हिरोशिमा की घटनाओं के बारे में सुनकर तथा उनके दुष्प्रभावों को प्रत्यक्ष देखकर भी विस्फोट का भोक्ता नहीं बन पाया। एक दिन वह जापान के हिरोशिमा नगर की एक सड़क पर घूम रहा था। अचानक उसकी नजर एक पत्थर पर पड़ी। उस पत्थर पर एक मानव की छाया छपी हुई थी। वास्तव में परमाणु विस्फोट के समय कोई मनुष्य उस पत्थर के पास खड़ा होगा। रेडियो-धर्मी किरणों ने उस आदमी को भाप की तरह उड़ाकर उसकी छाया पत्थर पर डाल दी थी। उसे देखकर लेखक के मन में अनुभूति जग गई। उसके मन में विस्फोट का प्रत्यक्ष दृश्य साकार हो उठा। उस समय वह विस्फोट का भोक्ता बन गया।
Q. कवि जयशंकर प्रसाद ने जो सुख का स्वप्न देखा था उसे कविता में किस रूप में अभिव्यक्त किया है?
[2009, 10, 11, 17]
उत्तर- कवि ने जो सुख का स्वप्न देखा था, उसे 'आत्मकथ्य' कविता में चाँदनी रात में मिलने वाली प्रेयसी के रूप में अभिव्यक्त किया है। कवि कहता है कि मुझे वह सुख कहाँ मिल पाया जिसका स्वप्न देखते-देखते मैं जाग गया था, जो सुख मेरे गले लगते-लगते मुस्कराते हुए दूर भाग गया। भाव यह कि कवि ने जिस सुख की कल्पना की वह उसे नहीं मिल पाया।
Q. 'माता का आँचल' पाठ में आए ऐसे प्रसंगों का वर्णन कीजिए जो आपके दिल को छू गए हों।
[2018, 19, 23, M.Set-23]
उत्तर- 'माता का आँचल' पाठ का सबसे रोमांचक प्रसंग वह है जब एक साँप सब बच्चों के पीछे पड़ जाता है। तब वे बच्चे किस प्रकार गिरते पड़ते भागते हैं और माँ की गोद में छिपकर सहारा लेते हैं। इस प्रसंग ने मेरे हृदय को भीतर तक हिला दिया।
इस पाठ में गुदगुदाने वाले कई प्रसंग हैं। विशेष रूप से बच्चे के पिता का मित्रतापूर्वक बच्चों के खेल में शामिल होना मन को छू लेता है। जैसे ही बच्चे भोज शादी का खेल खेलते हैं, बच्चे का पिता बच्चा बनकर उनमें शामिल हो जाता है। पिता का इस प्रकार बच्चा बन जाना बहुत सुखद अनुभव है जो मन को गुदगुदा गया।
इस पाठ में गुदगुदाने वाले कई प्रसंग हैं। विशेष रूप से बच्चे के पिता का मित्रतापूर्वक बच्चों के खेल में शामिल होना मन को छू लेता है। जैसे ही बच्चे भोज शादी का खेल खेलते हैं, बच्चे का पिता बच्चा बनकर उनमें शामिल हो जाता है। पिता का इस प्रकार बच्चा बन जाना बहुत सुखद अनुभव है जो मन को गुदगुदा गया।
Q. 'एक कहानी यह भी' आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को 'भटियारखाना' कहकर क्यों संबोधित किया है ?
उत्तर- लेखिका के पिता का आग्रह रहता था कि वह रसोई से दूर रहे। वे रसोई को 'भटियारखाना' कहते थे। उनका कहना था कि रसोई के इस भटियारखाने में रहने से व्यक्ति की प्रतिभा और क्षमता भट्ठी में चली जाती है अर्थात् नष्ट हो जाती है। वे इसे समय की बर्बादी मानते थे।
Q. नेताजी का चश्मा पाठ का क्या संदेश है?
उत्तर- नेताजी का चश्मा एक रोचक कहानी है। इसमें लेखक कहना चाहता है कि देशभक्ति का संबंध मन की भावना से है। देशभक्ति प्रकट करने के लिए न फौजी होना जरूरी है, न शरीर से शक्तिशाली होना। कोई भी मनुष्य, चाहे वह बच्चा हो या बूढ़ा, देशप्रेमी हो सकता है। यदि कोई मनुष्य अपने महापुरुषों के सम्मान के लिए छोटा-सा त्याग करता है, तो वह देशभक्त है।
Q. कवि की आँख फागुन की सुन्दरता से क्यों नहीं हट रही है ?
[2012,15, 17]
ans- कवि की आंखें फागुन की सुंदरता से इसलिए नहीं हट रही हैं क्योंकि फागुन का महीना प्रकृति की सुंदरता का प्रतीक है. इस महीने में प्रकृति का सौंदर्य अपनी चरम सीमा पर होता है.
i. कवि की आंखें फागुन की सुंदरता से नहीं हटने के कारण:
ii. फागुन का मौसम बहुत सुहाना होता है.
iii. फागुन में मौजूद रंग बिरंगे फूल, पत्ते और हवाएं बहुत खूबसूरत लगती हैं.
iv. फागुन का माहौल बहुत मस्त और शोभाशाली होता है.
v. फागुन के कारण मौसम इतना सुहाना हो जाता है कि उस पर से आँख हटाने का मन नहीं करता.
i. कवि की आंखें फागुन की सुंदरता से नहीं हटने के कारण:
ii. फागुन का मौसम बहुत सुहाना होता है.
iii. फागुन में मौजूद रंग बिरंगे फूल, पत्ते और हवाएं बहुत खूबसूरत लगती हैं.
iv. फागुन का माहौल बहुत मस्त और शोभाशाली होता है.
v. फागुन के कारण मौसम इतना सुहाना हो जाता है कि उस पर से आँख हटाने का मन नहीं करता.
Q. वह कौन-सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर?
उत्तर- लेखिका कॉलेज में हड़ताल करवाने में सबसे आगे रहती थी। एक बार कॉलेज के प्रिंसिपल का पत्र उसके पिताजी के नाम आया कि वे आकर मिलें और बताएँ कि उनकी बेटी की गतिविधियों के कारण उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए? इस पत्र को पढ़कर वे आग बबूला हो गए। उन्हें लगा कि कॉलेज में जाकर उन्हें काफी बातें सुननी पड़ेंगी। उनके कहर का अनुमान करके लेखिका अपनी सहेली के घर में छिपकर बैठ गई। कॉलेज जाकर पिताजी को प्रिंसिपल का यह कहना सुनने को मिला कि वह अपनी लड़की को घर पर बिठा ले क्योंकि उसके इशारे पर अन्य लड़कियाँ मैदान में जमा होकर नारे लगाने लगती हैं।
यह सुनकर पिताजी को अपने बेटी पर गर्व हुआ और वे प्रिंसिपल से यह कहकर आए कि यह तो पूरे देश की पुकार है, इसे कोई कैसे रोक सकता है। वे खुश होकर घर लौटे। जब लेखिका की माँ ने पिताजी के खुश होने के बारे में बताया तब लेखिका को इस पर सहज विश्वास नहीं हुआ।
यह सुनकर पिताजी को अपने बेटी पर गर्व हुआ और वे प्रिंसिपल से यह कहकर आए कि यह तो पूरे देश की पुकार है, इसे कोई कैसे रोक सकता है। वे खुश होकर घर लौटे। जब लेखिका की माँ ने पिताजी के खुश होने के बारे में बताया तब लेखिका को इस पर सहज विश्वास नहीं हुआ।
Q. बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे, तर्क सहित उत्तर दें।
उत्तर- बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे। उन्होंने 80 वर्षों तक लगातार शहनाई बजाई। उनसे बढ़कर शहनाई बजाने वाला भारत भर में अन्य कोई नहीं हुआ। फिर भी वे अंत तक खुदा से सच्चे सुर की माँग करते रहे। उन्हें अंत तक लगता रहा कि शायद अब भी खुदा उन्हें कोई सच्चा सुर देगा जिसे पाकर वे श्रोता की आँखों में आँसू ला देंगे। उन्होंने अपने को कभी पूर्ण नहीं माना। वे अपने पर झल्लाते भी थे कि क्यों उन्हें अब तक शहनाई को सही ढंग से बजाना नहीं आया। इससे पता चलता है कि वे सच्चे कला-उपासक थे। वे दो-चार राग गाकर उस्ताद नहीं हो गए। उन्होंने जीवन-भर अभ्यास-साधना जारी रखी।
Q. काशी में हो रहे, कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे ?
[JAC-2023, 19, 15, 11, 13, 9]
उत्तर- काशी जो संगीत, साहित्य और आदर की परम्पराओं के लिए प्रसिद्ध थी, अब वहाँ की परम्पराओं में परिवर्तन आ गया था। गायकों के मन में संगतकारों के प्रति आदर नहीं रहा, घंटो किए जाने वाले रियाज को कोई नहीं पूछता था। संगीत, साहित्य, आदर की अधिकतर परम्पराएँ समाप्त हो गई थीं। इन सबको देखकर बिस्मिल्ला खाँ व्यथित हो उठे थे।
Q. पान वाले का रेखा चित्र प्रस्तुत कीजिए।
पान वाला एक काला, मोटा और खुशमिजाज आदमी था। वह भारी भरकम तोंद वाला था। वह हमेशा मुँह में पान भरे रहता था। किसी से भी बात करते समय बार-बार पीक फेंकता था। जब वह हँसता था तो उसकी तोंद थिरकने लगती थी और मुँह से पान-पीक के छींटे निकलते थे।
वह चश्मे वाले तथा उसकी देश भक्ति का हमेशा मजाक उड़ाया करता था। पान वाला चश्मे वाले को देशभक्त नहीं मानता है। नेताजी को बार-बार चश्मा लगाने के कारण वह उसे पागल मानता है। वह तो केवल उसका ऊपरी रूप देखकर उसे एक लंगड़ा इंसान मानता है। उसके मन में चश्मे वाले की आंतरिक देशभक्ति के प्रति कोई सम्मान का भाव नहीं था।
वह चश्मे वाले तथा उसकी देश भक्ति का हमेशा मजाक उड़ाया करता था। पान वाला चश्मे वाले को देशभक्त नहीं मानता है। नेताजी को बार-बार चश्मा लगाने के कारण वह उसे पागल मानता है। वह तो केवल उसका ऊपरी रूप देखकर उसे एक लंगड़ा इंसान मानता है। उसके मन में चश्मे वाले की आंतरिक देशभक्ति के प्रति कोई सम्मान का भाव नहीं था।
Q. "वो लँगड़ा क्या जाएगा फ़ौज में। पागल है पागल!" कैप्टन के प्रति पानवाले की इस टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया दीजिए।
(2013,20)
पानवाले की यह टिप्पणी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। उसे चाहिए था कि वह चश्मेवाले कैप्टन की भावनाओं का सम्मान करता। उसे पता था कि कैप्टन ही सुभाषचंद्र बोस की आँखों पर अपनी ओर से चश्मा लगाए रहता है। वह भी केवल इसलिए कि नेताजी की मूर्ति अधूरी न लगे। उसकी इस भावना से देशभक्ति प्रकट होती है। अतः ऐसे व्यक्ति की कमियाँ या कुरूपता नहीं देखनी चाहिए। न ही ऐसे व्यक्ति को पागल कहना चाहिए।
अतः पानवाले की यह टिप्पणी गैर जिम्मेदाराना है।
अतः पानवाले की यह टिप्पणी गैर जिम्मेदाराना है।
Q. 'माता का अँचल' पाठ में माता-पिता का बच्चे के प्रति जो वात्सल्य व्यक्त हुआ है उसे अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर- इस पाठ में माता-पिता का बच्चे के प्रति वात्सल्य अनेक स्थलों पर व्यक्त हुआ है:
पिता-
(क) पिता बच्चे को अपने पास सुलाते हैं, उसे नहलाते धुलाते हैं तथा अपने पूजा पर बिठाते हैं। वे बच्चे को प्यार से 'भोलानाथ' कहकर पुकारते हैं, वे रास्ते में झुके हुए पेड़ों की डालों पर बिठाकर झूला झूलाते हैं।
(ख) कभी-कभी वे बच्चे के साथ कुश्ती लड़कर उसका उत्साह बढ़ाते हैं। वे बच्चे को चूमते हैं, उसे खट्टा-मीठा चुम्मा माँगते हैं। बच्चे द्वारा मूँछे नोंचने पर भी हँसते हैं।
(ग) पिता बच्चे को अपने हाथ से भात खिलाते हैं।
पिता-
(क) पिता बच्चे को अपने पास सुलाते हैं, उसे नहलाते धुलाते हैं तथा अपने पूजा पर बिठाते हैं। वे बच्चे को प्यार से 'भोलानाथ' कहकर पुकारते हैं, वे रास्ते में झुके हुए पेड़ों की डालों पर बिठाकर झूला झूलाते हैं।
(ख) कभी-कभी वे बच्चे के साथ कुश्ती लड़कर उसका उत्साह बढ़ाते हैं। वे बच्चे को चूमते हैं, उसे खट्टा-मीठा चुम्मा माँगते हैं। बच्चे द्वारा मूँछे नोंचने पर भी हँसते हैं।
(ग) पिता बच्चे को अपने हाथ से भात खिलाते हैं।
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.
